Sehat Ki Khabar: नमस्कार फिट रहे इंडिया की लेटेस्ट अपडेट्स में आपका स्वागत है. भारत में कैंसर और टिटनेस जैसी दवाओं की कीमतें महंगी हो गई है. इन कीमतों को बढ़ाने का सरकार ने फैसला क्यों लिया है. जानेंगे सेहत की खबर के पहले सेगमेंट में. सैनिकों के टेस्टोस्टेरोन बदलने का फैसला ले रहा अमेरिका क्यों? इसपर बात करेंगे सेहत की खबर के दूसरे सेगमेंट में. भारत में चैटजीपीटी से इलाज करवा रहे डॉक्टर्स इसपर बात करेंगे सेहत की खबर के तीसरे और आखिरी सेगमेंट में.
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कैंसर और टिटनेस की दवाएं महंगी
कैंसर और टिटनेस जैसी बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतें महंगी होने वाली हैं. सरकार की ओर से ऐसा फैसला लिया जा रहा है. इसके पीछे सरकार का कहना है कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि दवाओं को तैयार करने वाली कीमतों में बढ़ोतरी युद्ध के कारण हो रही है. जिसके कारण इन कीमतों में दवा बेचना मुश्किल हो जाता है. इसलिए डिमांड को रोकने के लिए कीमत में बढ़ोतरी की गई है.
अमेरिका ने लिया अजीबोगरीब फैसला
अमेरिका के रक्षा मंत्री ने एक फैसला सुनाया है. जिसपर काफी बवाल मचा है. ये फैसला सैनिकों के टेस्टोस्टेरोन से जुड़ा हुआ है. सैनिकों का कहना है कि टेस्टेस्टेरोन की स्क्रीनिंग करवाना एक साल में जरूरी होगा. इससे ये होगा जिसके टेस्टेस्टेरोन का लेवल कम होगा उन्हें टेस्टेस्टेरोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (TRT) की सलाह दी जाएगी. ताकि जो सैनिक फिट न हो वो भी फिट हो जाएं. इसपर बवाल इसलिए हो रहा है क्योंकि अमेरिकन यूरोलॉजिकल एसोसिएशन एंड एंडोक्राइन सोसाइटी का नियम बताता है कि टेस्टेस्टेरोन टेस्ट या फिर रिप्लेसमेंट की थेरेपी तभी दी जाती है जब हार्मोन की कमी साफ तौर पर दिखे जैसे ज्यादा थकान. मसल्स में कमी आना, लो लिबिडो या फिर हड्डियां का कमजोर होना.
डॉक्टर्स कर रहे AI का इस्तेमाल
एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है. जिसमें जानकारी मिली की कई डॉक्टर्स एआई का इस्तेमाल. मेडिकल रिसर्च, क्लीनिकल नोट्स को तैयार करने, बीमारी के बारे में समझने के लिए और उस बीमारी को लोगों को समझाने के लिए डॉक्टर्स एआई का सहारा ले रहे हैं. जो एक रिस्क है. क्योंकि जो एआई चैटबॉट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं उन्हें ऐसे डिसीजन लेने के लिए तैयार नहीं किया गया है. इसपर एक रिपोर्ट पब्लिश हुई है. रिपोर्ट कहती है भारत में 48 प्रतिशत डॉक्टर्स ऐआई का इस्तेमाल कर रहे हैं. 54 प्रतिशत ऐसे हैं जो चैटजीपीटी, क्लॉड जैसे टूल्स का इस्तेमाल करते हैं. हालांकि 26 प्रतिशत डॉक्टर्स ऐसे हैं जो मेडिकल रिसर्च, क्लिनिकल डेटा पर आधारित ही AI प्लेटफॉर्मस का रेगुलर इस्तेमाल करते हैं. नर्सों में भी यही स्थिति देखने को मिली, जहां सामान्य एआई का उपयोग विशेष मेडिकल एआई की तुलना में अधिक पाया गया.
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