Toilet Paper Truth: आप वॉशरूम में टॉयलेट पेपर का इस्तेमाल करते हैं? दरअसल वेस्टर्न पॉट्स का इस्तेमाल करते-करते हम लोगों ने वेस्टर्न आदतों को भी अपनाना शुरू कर दिया है. इसमें टॉयलेट पेपर शामिल है. कुछ लोग वॉशरूम में टॉयलेट पेपर का इस्तेमाल करते हैं. अगर आप भी उन्हीं लोगों में से एक हैं, तो संभव है कि ये जानकारी जानकर आपकी ये आदत छूट सकती है.
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में फिजिशियन साइंटिस्ट डॉक्टर त्रिशा Pasricha ने एक पॉडकास्ट के दौरान चौंकाने वाला खुलासा किया है. इसे सुनकर कई लोगों को हैरानी हुई. त्रिशा के अनुसार सूखे टॉयलेट पेपर पर निर्भर रहना पूरी तरह से सही नहीं है. उनका मानना है कि सिर्फ टॉयलेट पेपर ही एक समाधान है ऐसा वो नहीं मानती. इसी के साथ उन्होंने कहा कि हमें पानी से साफ करने वाली सीट यानी बिडेट की जरूरत है. हालांकि इस बातचीत के दौरान उन्होंने ये भी स्वीकार किया कि कई अमेरिकन लोग इस बात से सहमत नहीं होेंगे. इस पॉडकास्ट के बाद टॉयलेट पेपर को लेकर एक बहस छिड़ चुकी है.
टॉयलेट पेपर नहीं कर सकता कमाल
इस टॉपिक ने इस नई डिबेट को जन्म दिया है. दरअसल पॉडकास्ट के दौरान त्रिशा ने कहा कि पानी से सफाई काफी प्रभावी है. लेकिन पेपर से ऐसा मुंकिन नहीं. हालांकि उन्होंने इसके पीछे का तर्क भी बताया कि बिडेट का काम काफी आसान होता है. एक नोजल स्प्रे और बाहरी हिस्से की सफाई हो जाती है. ये कमाल पानी कर सकता है लेकिन साझार पेपर नहीं. उन्होंने ये भी बताया कि एक नॉर्मल सा बिडेट काफी सस्ता आता है. जिसे आप खुद भी इंस्टॉल कर सकते हैं. लेकिन वहीं लग्जरी जैसे हिटेड में आपको कई सुविधाएं मिल सकती हैं. वो अपने मुद्दे पर टिकी रहीं और उन्होंने कहा कि बिडेट आपके पूरे शरीर को अच्छे से साफ करती है लेकिन टॉयलेट पेपर ऐसा नहीं कर पाता.
वहीं इस दौरान उन्होंने साल 2023 में हुई एक स्टडी का सोर्स दिया और कहा कि जब लोग टॉयलेट पेपर से साफ करके हैं, तो इस दौरान हाथों में माइक्रोब्स पाए जाते हैं. ऐसा रिसर्च में भी सामने आ चुका है. लेकिन बिडेट इस्तेमाल करने वाले लोगों में माइक्रोब्स कम थे. इतना ही नहीं त्रिशा ने बताया कि जब आप बार-बार टॉयलेट पेपर की मदद से सफाई के लिए पोंछते हैं, तो ये सेंसिटीव हिस्से को नुकसान पहुंचाता है. यानी आप सोचिए कि हम अपनी बॉडी के सबसे नाजुक हिस्से के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं. इसका नतीजा होता है कि सेंसटिवीटी या फिर जलन की समस्या हो सकती है.
आदत को बदलने की जरूरत
इस पॉडकास्ट के बाद काफी बहस छिड़ी लोगों के मन में सवाल उठने लगे कि आखिर उन्हें जब टॉयलेट पेपर की आदत हो गई तो वो क्या कर सकते हैं. इस तरह के सवाल आना स्वाभाविक भी है. क्योंकि आप काफी सालों से या काफी समय से उसी रूटीन को फॉलो कर रहे हैं. ऐसे लोगों के लिए त्रिशा ने तरीका बताया कि आप जोर से रगड़कर पोंछने के बजाए डैब करें.
यानी हल्के से थपथपाकर पोंछने की कोशिश करें. ऐसा करने से माइक्रोस्कोपिक में चोट नहीं लगती है. खासकर जिन लोगों को फिशर, बवासीर या डिलीवरी के बाद समस्या होती है, उनके लिए यह तरीका बेहतर है.” वहीं डॉ. पासरिचा ने रेक्टल ब्लीडिंग को लेकर भी चेतावनी दी. उन्होंने कहा,”अगर खून आ रहा है और न तो बवासीर है, न ही फिशर, तो ऐसे में कोलोनोस्कोपी करवाना जरूरी हो जाता है.”
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(Disclaimer: यहां दी गई सलाह और ये कॉन्टेंट केवल सामान्य जानकारी के लिए पेश किया गया है. यानी ये जानकारी किसी भी तरह से डॉक्टर्स राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए आप किसी एक्सपर्ट्स या फिर जिस समस्या से जूझ रहे हैं, उस क्षेत्र के डॉक्टर से सलाह लेने के बाद ही उस एडवाइस पर अमल करें. Fit Rahe India इस जानकारी के लिए किसी भी जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)


