What is Posthumous Sperm Retrieval: केरल के हाईकोर्ट ने हाल ही में एक फैसला सुनाया. जिसने सभी को चौंका डाला है. इस मामले की काफी चर्चा होने लगी है. दरअसल हाईकोर्ट ने एक महिला को उसके ब्रेन-डेड पति के स्पर्म को सुरक्षित रखने की परमिशन दी है. जैसे ही कोर्ट का फैसला सामने आया, उसी दौरान से इसकी काफी चर्चा होने लगी. जब कोई व्यक्ति ब्रेन-डेड होता है, तब उसकी स्थिति जीवन और मृत्यु के बीच मानी जाती है.
क्योंकि कोर्ट ने फैसला सुनाया इसके बाद से ही कई सवाल सामने आ रहे हैं, कि क्या ऐसा करना सुरक्षित होगा. अगर इसका जवाब हां है तो इसका प्रोसेस क्या है. कैसे स्पर्म को सुरक्षित रखा जाएगा. किस तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा. इस तरह के कई सवाल सामने आ रही है. हालांकि महिला के लिए ये काफी इमोशनल चीज होगी. लेकिन ये कानूनी रूप से भी काफी जरूरी है.
क्या है पोस्टह्यूमस स्पर्म रिट्रीवल (What is Posthumous Sperm Retrieval)?
कोर्ट के आदेश के बाद महिला के ब्रेन डेड पति के स्पर्म को किस प्रक्रिया से निकाला जाएगा. इस प्रोसेस को मेडिकल साइंस में क्या कहा जाता है. तो बता दें कि जब कोई व्यक्ति इस कंडिशन का सामना कर रहा होता है तो उसके स्पर्म को पोस्टह्यूमस स्पर्म रिट्रीवल प्रोसेस के जरिए निकाला जाता है. ये इसलिए किया जाता है ताकि भविष्य में बच्चे की प्राप्चि के लिए उन स्पर्म्स का इस्तेमाल किया जा सके. गौर करने वाली बात है कि इस प्रोसेस को आमतौर पर 24 से 36 घंटे के अंदर ही किया जाता है. इस समय सीमा के अंदर ही स्पर्म निकालना बेहद जरूरी होता है.
स्पर्म निकालने के तरीके | Methods for Extracting Sperm
ये जानकारी सामने आने के बाद कई सवाल सामने आ रहे हैं. ये भी सवाल आता है कि आखिर स्पर्म को निकालने का तरीका क्या होगा. जानकारी के अनुसार तीन प्रोसेस के जरिए स्पर्म ऐसे व्यक्ति से निकाला जाता है. पहला सर्जिकल तरीका. इसमें अंडकोष या एपिडिडिमिस से सीधे स्पर्म निकाले जाते हैं. दूसरा प्रोसेस है एस्पिरेशन (Aspiration) इसमें सुई के जरिए बिना बड़ी सर्जरी के स्पर्म निकाले जाते हैं. तीसरा इलेक्ट्रो-इजैकुलेशन (Electro-ejaculation): हल्के इलेक्ट्रिक स्टिमुलेशन से स्पर्म प्राप्त करने की कोशिश की जाती है (कम मामलों में उपयोग).
कैसे रखा जाता है स्पर्म को सुरक्षित? How is Sperm Preserved?
इस कंडिशन में जब स्पर्म को निकाल लिया जाता है, तो उसे प्रीजर्व्ड कैसे किया जाता है. आपको बता दें कि इसे क्रायोप्रिजर्वेशन (फ्रीजिंग) के जरिए लंबे समय तक सेफ रखा जाता है. बाद में इन्हें IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) या ICSI तकनीक से उपयोग किया जाता है. वहीं IVF के दौरान लैब में एग और स्पर्म को मिलाकर भ्रूण को बनाया जाता है. जिसे गर्भाशय यानी यूट्रेस में डाला जाता है. ICSI एक स्पर्म को सीधे एग में इंजेक्ट किया जाता है, यह ज्यादा एडवांस तकनीक है.
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(Disclaimer: यहां दी गई सलाह और ये कॉन्टेंट केवल सामान्य जानकारी के लिए पेश किया गया है. यानी ये जानकारी किसी भी तरह से डॉक्टर्स राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए आप किसी एक्सपर्ट्स या फिर जिस समस्या से जूझ रहे हैं, उस क्षेत्र के डॉक्टर से सलाह लेने के बाद ही उस एडवाइस पर अमल करें. Fit Rahe India इस जानकारी के लिए किसी भी जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)


