Epilepsy and Behavior Journal: ऑल इंडिया भारतीय आयुर्विज्ञान यानी (AIIMS) की नई स्टडी सामने आई है. जिसमें बताया गया कि फंक्शनल डिसोसिएटिव सीजर्स (FDS) से पीड़ित कई मरीजों की कंडिशन केवल स्ट्रक्चर्ड साइकोलॉजिकल थेरेपी और सही जानकारी (Psychoeducation) से बेहतर हो सकती है. यानी हर मरीज को अतिरिक्त दवा की जरूरत नहीं पड़ती.
इंटरनेशनल लेवल पर मशहूर जर्नल एपिलेप्सी एंड बिहेवियर में छपे ये नतीजे इस कंडीशन को मैनेज करने के तरीके को बदलने में मदद कर सकते हैं और मरीज़ों और उनके परिवारों को नई उम्मीद दे सकते हैं. इस रिसर्च को AIIMS, दिल्ली में न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट की हेड डॉ. मंजरी त्रिपाठी ने लीड किया था.
FDS सीजर्स क्या होता है?
अब जान लेते हैं कि FDS यानी फंक्शनल डिसोसिएटिव सीजर्स क्या होता है. इसपर डॉक्टर मंजरी त्रिपाठी कहते हैं कि ये अक्सर मिर्गी के दौरे की तरह ही दिखाई देते हैं. लेकिन दोनों बीमारी एक जैसी बिल्कुल भी नहीं है. क्योंकि मिर्गी के दौरे दिमाग की असामान्य इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी के कारण आते हैं. लेकिन FDS में ऐसा नहीं होता है. ये समस्या स्ट्रेस, इमोशनल ट्रॉमा, मेंटल हेल्थ से संबंधित समस्या के कारण होती है, और इन्हीं के कारण हो सकती है. लेकिन क्योंकि दोनों के लक्षण एक दूसरे से काफी मिलते हैं इसलिए कई मरीजों को बीमारी का पता लगाने से पहले सालों भर तक मिर्गी का इलाज ही लेना पड़ सकता है.
सालों तक चलता है इलाज
रिसर्चर्स का मानना है कि इस बीमारी के लक्षण काफी हद तक मिर्गी से मिलते जुलते होते हैं. नतीजा कई मीरजों को समय से बीमारी का पता नहीं चल पाता और लंबे समय तक मिर्गी का इलाज लेना पड़ता है. एम्स की इस स्टडी से ये संकेत मिलता है कि अगर सही समय पर और सही पहचान मरीजों को मिल जाए तो साइकैक्ट्रिस्ट से काउंसलिंग मिलने पर कई मरीजों की कंडिशन में सुधार देखने को मिल सकता है.
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