Autism In Children: पिछले कुछ सालों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के मामलों में तेजी से बूस्ट देखा जा रहा है. खासतौर पर बच्चों में इसके मामले तेजी से बढ़ते जा रहे हैं. जानकारी के अनुसार शिशु जब जन्म लेता है, जन्म लेने के 9 महीने बाद ही इस समस्या के संकेत देखने को मिल जाते हैं. लेकिन पेरंट्स इसे समझ नहीं पाते.
जब बच्चा तीन से चार साल की उम्र को क्रॉस करता है, तो कंडिशन और भी क्लियर होती चली जाती है. आंकड़ों की अगर बात की जाए तो इसपर कई रिसर्च पहले की जा चुकी है. रिपोर्ट्स के अनुसार ही भारत में हर 68 बच्चे में से एक बच्चा ऑटिस्टिक पाया जाता है. यही आंकड़े ये भी बताते हैं, कि ये समस्या लड़कियों के मुकाबले लड़कों में अधिक पाई जाती है. अगर आप ऐसा सोच रहे हैं, कि ये समस्या सिर्फ बच्चों को ही होती है, तो आप गलत है, ये समस्या अडल्ट्स को भी परेशान कर सकती है.
ऑटिज्म है क्या?
पहले जान लेते हैं, कि ऑटिज्म है क्या? तो बता दें कि ये एक तरह का न्यूरो डेवलपमेंट डिसऑर्डर है. यानी ऑटिज्म के कारण बच्चे सीखने, बोलने, बिहेव करने या फिर किसी से भी कम्युनिकेट करने में दिक्कतों का सामना करते हैं. हालांकि हर व्यक्ति की ऑटिज्म की गंभीरता अलग-अलग होती है. इसलिए इसे हर व्यक्ति के लिए एक जैसे लक्षण समझना गलत होगा. वहीं जन्म से कुछ बच्चों के आटिस्टिक होने का कारण होता है जेनेटिक. यानी जेनेटिक इसके पीछे का कारण बताए जाते हैं. हालांकि अब तक इस बीमारी के पीछे का ठोस कारण सामने नहीं आया है.
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जन्म के बाद दिखाई देते लक्षण
ऑटिज्म के लक्षणों की अगर बात की जाए तो बच्चे के जन्म के ही कुछ महीने बाद इसके लक्षण दिखाई देने लगते हैं. इसमें कम हंसना, आंखें चुराना, बातें न करना शामिल है. जब कोई बच्चा किसी की गोद में जाकर हंसता नहीं है या फिर आंख नहीं मिलाता, बच्चा सुनता जरूर है पर रिएक्ट नहीं करता ये भी ऑटिज्म हो सकता है. कम बोलना, या फिर बोलने में परेशानी, छोटी-छोटी बात पर ज्यादा गुस्सा आना, सोने में या फिर नींद में दिक्कत, खाने पीने में समस्या, बार-बार एक बात को दोहराना. इस तरह के लक्षण दिखाई देते हैं.
क्या है ऑटिज्म का इलाज?
अगर इसके इलाज की बात की जाए तो इसे दवाओं से ठीक नहीं किया जा सकता. दरअसल इसका इलाज सिर्फ दवाओं से ही संभव नहीं है. बल्कि थेरेपी और इसमें परिवार की भी सहायता की उतनी जरूरत होती है. इस थेरेपी को केवल प्रोफेशनल मनोचिकित्सक करें तो ज्यादा बेहतर रिजल्ट मिल सकते हैं, और इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है. ये भी बता दें कि बच्चे को ये परेशानी है या नहीं इसे कंफर्म करने की भी जांच नहीं होती. केवल बच्चे के हाव-भाव और माता-पिता संग बातचीत करने के बाद ही स्थिति समझ आती है.
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(Disclaimer: यहां दी गई सलाह और ये कॉन्टेंट केवल सामान्य जानकारी के लिए पेश किया गया है. यानी ये जानकारी किसी भी तरह से डॉक्टर्स राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए आप किसी एक्सपर्ट्स या फिर जिस समस्या से जूझ रहे हैं, उस क्षेत्र के डॉक्टर से सलाह लेने के बाद ही उस एडवाइस पर अमल करें. Fit Rahe India इस जानकारी के लिए किसी भी जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)


