Medicine Price Rise India: ईरान, इजराइल और अमेरिका ये तीन देशों के बीच तनाव जारी है. इस तनाव की गूंज भारत तक भी सुनाई देने लगी है. इसका असर भारत के हेल्थकेयर सिस्टम पर भी पड़ने लगा है. दरअसल दवा कंपनियों के सप्लाई चेन में रुकावट देखने को मिल रही है. कंपनियों ने कच्चे माल की बढ़ती कीमतों और उत्पादन लागत में अचानक उछाल को लेकर चिंता जाहिर की है. अब अगर यही स्थिती रही तो इसका असर सीधे तौर पर मरीजों को देखना पड़ सकता है.
बात करें कि किस तरह मरीजों पर इसका असर पड़ेगा तो बता दें कि अगर हालात इसी तरह रहे तो दवाओं की कमी, देरी और महंगे इलाज लोगों को मिलेंगे. इस तरह की समस्या का सामना लोगों को करना पड़ सकता है. वहीं इस जंग के कारण दवाओं पर इसका असर पड़ रहा है. कौन सी दवाएं होंगी. जिनपर असर पड़ेगा? इसके बारे में जानेंगे.
जंग का किन दवाओं पर पड़ेगा असर?
चिंता वाली बात इसलिए भी है कि अगर ये स्थिती नहीं थमी तो रोमर्रा के इस्तेमाल में होने वाली दवाएं जैसे बुखार, इंफेक्शन, डायबिटीज यहां तक की दिल की बीमारियों के इलाज में मिलने वाली दवाओं पर इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है. उधर कंपनियों का भी ऐसा कहना है कि अगर स्थिती इसी तरह रही तो दवाओं की प्रोडक्शन में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है.
रिपोर्ट्स के अनुसार इस कमी में पैरासिटामोल जैसी आम दवा भी मिलना मुश्किल हो सकती है. आज के समय में हर किसी के घरों में पैरासिटामोल इस्तेमाल की जाती है. लेकिन अगर स्थिती ऐसी ही बनी रहती है तो ये दवा भी या तो महंगी हो जाएगी या फिर बाजारों से आसानी से नहीं मिल पाएगी. इतना ही नहीं यही स्थिति एंटीबायोटिक्स, डायबिटीज और दिल की दवाओं के साथ भी बन सकती है. ऐसे में मरीजों को दवा बदलनी पड़ सकती है, डोज मिस हो सकती है या ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ सकते हैं.
पैरासिटामोल की लागत हुई दोगुनी
आप पूछेंगे कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है. इसका सीधा कारण है कच्चे माल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी. इसपर फार्मा कंपनियों का कहना है कि एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स, सॉल्वेंट्स और अन्य जरूरी पदार्थों की कीमतें महज 15 दिनों में 200 से 300 फीसदी तक बढ़ गई हैं. यहां तक की पैरासिटामोल को भी बनाने की लागत दोगुनी होती जा रही है. जहां पहले कीमत 250 प्रति किलो थी वो अब बढ़कर 450 रुपये तक पहुंच चुकी है.
दरअसल तनाव की स्थिती इतनी गंभीर हो चुकी है. इसका सीधा असर और प्रभाव ट्रांसपोर्ट पर पड़ना शुरू हो चुका है. ट्रांसपोर्ट महंगा हुआ है. साथ ही सप्लाई धीमी पड़ गई. इस कारण ये समस्या देखी जा रही है. अब ऐसा नहीं कि कंपनियां पहले ही सामान को स्टॉक करकर नहीं रखती थी. कंपनियां 3 या फिर 6 महिने के स्टॉक को पहले से तैयार रखती है. लेकिन हालात अभी भी बेकाबू है. तनाव थमने का नाम नहीं ले रहा. जिसके कारण इसका सीधा असर छोटे और मीडियम फार्मा मैन्यूफैक्चरर्स पर पड़ रहा है.
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