Canine Cancer Detection: कैंसर का नाम सुनते ही अच्छे-अच्छों के रौंगटे खड़े हो जाते हैं. क्योंकि इसे दुनिया की सबसे खतरनाक बीमारियों में गिना जाता है. इसी में कैंसर के ही कुछ प्रकार हैं जिनकी पहचान तीसरे स्टेज में जाकर होती है. इसमें कोलोरेक्टल कैंसर मौजूद है. जब ये बीमारी तीसरे स्टेज तक चली जाए तो डॉक्टर का पीड़ित मरीज को बचा पाना काफी मुश्किल हो जाता है.
लेकिन अगर आपसे ऐसा कहें कि अब जल्द ही इसकी पहचान की जाएगी. BBC हिन्दी की एक रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले समय में कुत्तों की मदद से कैंसर की पहचान बहुत जल्दी कुत्तों द्वारा की जा सकेगी. बताया गया कि कैंसर की अर्ली स्टेज में पहचान के लिए कुत्तों का इस्तेमाल किया जाएगा. इस खास तरीके से कुत्तों को ट्रेन किया जा रहा है.
कैसे लगेगा कैंसर का पता?
जानकारी के मुताबिक इस समय इजरायल, अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, ताइवान जैसे देश इस समय कुत्तों की मदद से कैंसर का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं. इस खास तरह से उन्हें ट्रेनिंग देने का काम किया जा रहा है. ऐसे में अगर ये टेस्ट सफल रहा तो वो दिन दूर नहीं जब कैंसर का भी पता आसानी से लगाया जा सकेगा.
इस कंपनी ने की शुरुआत
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में भी पहली बार कर्नाटक के छह अलग अस्पतालों में ऐसे ट्रेंड कुत्तों की मदद की गई. इन्हीं कुत्तों की मदद से एक स्टडी की जा रही है. बताया गया कि इन कुत्तों ने अब तक 1502 मरीजों के सैंपल्स को सूंघा था. जिनमें 91 प्रतिशत मामलों में कुत्तों ने ये सूंघकर बता दिया कि किन-किन मरीजों को सात बड़े तरीके के कैंसर हैं और किन्हें कैंसर का खतरा नहीं है. जानकारी के मुताबिक इस स्टडी को बैंगलुरू की एक स्टार्टअप कंपनी डॉगनोसिस द्वारा किया गया है. इतना ही नहीं इसके रिजल्ट्स जर्नल ऑफ क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी में भी पब्लिश हुए हैं. वहीं इस स्टडी को डॉक्टर संजीव कुलोड की अगुवाई में किया गया. संजीव कुलगोड कर्नाटक के हुब्बली में स्थित रेड ऑन कैंसर सेंटर के सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट और उसके डायरेक्टर भी हैं.
कुत्तों के अंदर होती है ये स्किल्स
सभी जानते हैं कि कुत्तों के सूंघने की स्किल्स इंसानों से 10 हजार गुना से लेकर एक लाख गुना अधिक तेज होती है. दरअसल कुत्तों के पास किसी भी गंध को सूंघकर उस गंध के मॉलीक्यूल्स को पकड़ने की अद्धभुत शक्ति होती है. यही कारण है कि डॉग्स इंसानों के कंपेयर में काफी सेंसिटीव माने जाते हैं. आपको बता दें कि डॉग्स की नाक में लगभग 300 मिलियन गंध रिसेप्टर्स होते हैं. ये उन बीमारी को पकड़ने और उन हिडेन वस्तुओं का पता लगाने में सक्षम बनाते हैं. यही वजह है कि उनकी नाक को एक ‘सुपर कंप्यूटर’ माना जाता है.
यह भी पढ़ें: दिल्ली में इन इलाकों से सामने आए 12 हजार टीबी के मरीज, खास अभियान के तहत हुआ चौंकाने वाला खुलासा!
(Disclaimer: यहां दी गई सलाह और ये कॉन्टेंट केवल सामान्य जानकारी के लिए पेश किया गया है. यानी ये जानकारी किसी भी तरह से डॉक्टर्स राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए आप किसी एक्सपर्ट्स या फिर जिस समस्या से जूझ रहे हैं, उस क्षेत्र के डॉक्टर से सलाह लेने के बाद ही उस एडवाइस पर अमल करें. Fit Rahe India इस जानकारी के लिए किसी भी जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है. इस तरह के कॉन्टेंट को देखने के लिए आप हमारे Youtube चैनल के साथ जुड़ सकते हैं. )

