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हल्दी में लेड कैसे पहुंचता है? नई स्टडी में हु बड़ा खुलासा

Lead in Turmeric Study: नई स्टडी में खुलासा हुआ है कि खेतों की कच्ची हल्दी में लेड सुरक्षित सीमा के भीतर है. बाजार में बिकने वाले हल्दी पाउडर में प्रोसेसिंग या मिलावट के दौरान लेड पहुंचने की आशंका जताई गई है.

Lead in Turmeric Study: भारतीय खाने का अहम हिस्सा मानी जाने वाली हल्दी को लेकर एक नई स्टडी सामने आई है. पर्यावरण संगठन टॉक्सिक्स लिंक (Toxics Link) की रिपोर्ट के मुताबिक, खेतों से सीधे ली गई कच्ची हल्दी में लेड (Lead) की मात्रा बेहद कम पाई गई है और यह FSSAI द्वारा तय सुरक्षित सीमा के अंदर है, इससे संकेत मिलता है कि बाजार में मिलने वाले हल्दी पाउडर में लेड की मिलावट खेती के दौरान नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, हैंडलिंग या जानबूझकर की गई मिलावट के दौरान हो सकती है.

इस स्टडी में महाराष्ट्र, तेलंगाना, तमिलनाडु, ओडिशा, कर्नाटक और मध्य प्रदेश के किसानों से सीधे 13 कच्ची हल्दी (Rhizome) के नमूने लिए गए. इन सभी सैंपलों की जांच NABL मान्यता प्राप्त लैब में आधुनिक तकनीक ICP-MS से की गई. रिपोर्ट के अनुसार, सभी नमूनों में लेड की मात्रा 0.05 mg/kg से 1.87 mg/kg के बीच रही, जबकि FSSAI ने हल्दी में लेड की अधिकतम सीमा 10 mg/kg तय की है.

खेत में नहीं, सप्लाई चेन में हो सकती है मिलावट

रिपोर्ट बताती है कि प्राकृतिक रूप से उगाई गई हल्दी में लेड की मात्रा बहुत कम होती है. ऐसे में बाजार में बिकने वाले हल्दी पाउडर में अधिक लेड मिलने की वजह खेती नहीं, बल्कि कटाई के बाद की प्रक्रिया हो सकती है. विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ मामलों में हल्दी का रंग ज्यादा चमकीला दिखाने और बाजार में उसकी कीमत बढ़ाने के लिए लेड क्रोमेट (Lead Chromate) जैसी जहरीली सामग्री मिलाई जा सकती है.

लेड सेहत के लिए कितना खतरनाक है?

लेड एक जहरीली भारी धातु (Heavy Metal) है. खासकर बच्चों के लिए यह बेहद नुकसानदायक मानी जाती है. इसके कारण:

  • दिमाग के विकास पर असर पड़ सकता है.
  • IQ कम हो सकता है.
  • सीखने और याददाश्त से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं.
  • व्यवहार संबंधी दिक्कतें बढ़ सकती हैं.
  • किडनी और दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है.
  • प्रजनन क्षमता भी प्रभावित हो सकती है.

भारत में हल्दी का इस्तेमाल लगभग हर घर में रोजाना खाना बनाने, आयुर्वेद और धार्मिक कार्यों में होता है. इसलिए इसमें किसी भी तरह की मिलावट सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है.

क्या बोले टॉक्सिक्स लिंक के विशेषज्ञ?

टॉक्सिक्स लिंक के एसोसिएट डायरेक्टर सतीश सिन्हा ने कहा कि स्टडी से साफ है कि खेतों में उगाई गई हल्दी आमतौर पर फूड सेफ्टी मानकों का पालन करती है. इसलिए अब प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग के दौरान निगरानी बढ़ाने की जरूरत है, ताकि उपभोक्ताओं तक सुरक्षित उत्पाद पहुंच सके.

क्या हैं रिपोर्ट की सिफारिशें?

रिपोर्ट में FSSAI और राज्य खाद्य सुरक्षा विभागों से सुझाव दिया गया है कि:

  • बाजार में बिकने वाली हल्दी और मसालों की नियमित जांच बढ़ाई जाए.
  • सप्लाई चेन की ट्रेसबिलिटी मजबूत की जाए.
  • प्रोसेसिंग और पैकेजिंग यूनिट्स का नियमित निरीक्षण किया जाए.
  • जानबूझकर मिलावट करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए.
  • मिट्टी, सिंचाई के पानी और प्रोसेसिंग यूनिट्स पर बड़े स्तर की रिसर्च कराई जाए.

भारत के लिए क्यों अहम है यह रिपोर्ट?

भारत दुनिया में हल्दी का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और निर्यातक देश है. ऐसे में हल्दी की गुणवत्ता बनाए रखना न सिर्फ देश के लोगों की सेहत के लिए जरूरी है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय मसालों की साख बनाए रखने के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है.

यह भी पढ़ें: जिम वाले स्टेरॉयड और डॉक्टर के स्टेरॉयड में क्या है बड़ा अंतर?

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sarthak arora Senior Sub Editor
अपनी उंगलियों से खबरों को खटाखट लिखना, और लिखने से पहले पढ़ना और समझना. इस तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में 7 साल का अनुभव पाया. कार्य जारी है और इसी तरह लिखना, पढ़ना और सीखना निरंतर जारी रहेगा.
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