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Obesity in Thin People: पतले लोग भी मोटापे का शिकार, छुपा हुआ मोटापा कर सकता है बड़ा नुकसान!

Obesity in Thin People: अगर लंबे समय तक हमारे शरीर में इंसुलिन का स्तर बना रहे तो ये न केवल डायबिटीज बल्कि एक गंभीर बीमारी बन सकता है.

Obesity in Thin People: अगर लंबे समय तक हमारे शरीर में इंसुलिन का स्तर बना रहे तो ये न केवल डायबिटीज बल्कि एक गंभीर बीमारी बन सकता है. आपको बता दें कि इंसुलिन एक जरूरी हार्मोन है जो खून में शुगर को कंट्रोल करता है. साथ ही उसे शरीर के सेल्स तक पहुंचाकर एनर्जी में बदलने में हमारी मदद करता है

लेकिन आजकल हमारा लाइफस्टाइल इतना खराब हो चुका है जिसमें लगातार मीठा खाना, जंक फूड का सेवन, प्रोसेस्ड खाना खाना और कम फिजिकल एक्टीविटी करना. ऐसा करने से शरीर में बार-बार अधिक इंसुलिन बनने लगता है. धीरे-धीरे इसका स्तर ऊंचा रहने लगता है. वहीं इसपर एक रिसर्च हुई और जानकारी मिली कि ऐसी स्थिती अगर लगातार बनी रहे तो शरीर में फैट जमा होने लगता है. खासतौर पर पेट के आसपास चर्बी बढ़ने लगती है. नतीजा मोटापा बढ़ता है. साथ ही शरीर की सेल्स इंसुलिन के प्रति कम सेंसिटिव हो जाती हैं. इसे ही इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है, और यही आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज का बड़ा कारण बनता है.

लंबे समय तक इंसुलिन बने रहने से क्या होता है?

आपको बता दें कि अगर लंबे समय तक ऐसी स्थिती बनी रहे तो शरीर में सूजन बढ़ने लगती है. नतीजा इसका असर दिल और खून की नसों पर पड़ता है. हार्ट डिजीज का भी खतरा बढ़ता है. ये हमारे मेटाबॉलिज्म को स्लो कर देता है. कई मामलों में फैटी लिवर की भी समस्याएं पैदा हो सकती हैं.

मोटापा समझने के लिए बदलना होगा तरीका

अब इस मामले पर मशहूर डॉ. अनूप मिश्रा भारत के एक प्रख्यात एंडोक्रिनोलॉजिस्ट (मधुमेह विशेषज्ञ) हैं, जो नई दिल्ली में Fortis C-DOC Hospital के अध्यक्ष है. उनका कहना है कि एशियाई लोगों को मोटापे को समझने का तरीका बदलना होगा. क्योंकि यहां के लोगों का कम BMI होने के बावजूद शरीर के अंदर खतरनाक चर्बी यानी विसरल और एक्टोपिक फैट ज्यादा जमा होता है, बीटा-सेल की क्षमता कम होती है, मांसपेशियां कम और चर्बी ज्यादा होती है (सार्कोपेनिक ओबेसिटी) और दिल व मेटाबॉलिज्म से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी कम वजन पर ही बढ़ जाता है.

इसी कारण से सिर्फ BMI के आधार पर ही मोटापा तय करना कोई बार गलत साबित हो सकता है. बीमारी पकड़ में नहीं आती. अब एक नया तरीका सुझाया जा रहा है जिसमें केवल वजन या BMI नहीं, बल्कि शरीर की बनावट, फैट का स्तर, मेटाबॉलिक हेल्थ, अंगों की कार्यक्षमता और नए बायोमार्कर्स को मिलाकर यह तय किया जाएगा कि व्यक्ति प्रीक्लिनिकल स्टेज में है या क्लिनिकल मोटापे की स्थिति में पहुंच चुका है. इससे बीमारी का जल्दी और सही पता लगाया जा सकेगा और उसी हिसाब से इलाज—जैसे लाइफस्टाइल बदलाव, दवाइयां या जरूरत पड़ने पर सर्जरी की जा सकेगी.

शरीर के अंदर होने वाले बदलाव से जानें मोटापा

डॉक्टर अनुप कुमार के अनुसार, “एशियाई लोगों में मोटापा सिर्फ वजन से नहीं समझा जा सकता, क्योंकि कम BMI पर भी शरीर के अंदर खतरनाक फैट जमा हो सकता है और बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है. इसलिए जरूरी है कि हम मोटापे को सिर्फ दिखने से नहीं, बल्कि शरीर के अंदर हो रहे बदलाव और अंगों की कार्यक्षमता के आधार पर पहचानें, ताकि समय रहते सही इलाज शुरू किया जा सके.

यह भी पढ़ें: क्या बिरयानी और तरबूज एक साथ खाने पर हो जाती है मौत? जानिए- क्या कहते हैं डॉक्टर

(Disclaimer: यहां दी गई सलाह और ये कॉन्टेंट केवल सामान्य जानकारी के लिए पेश किया गया है. यानी ये जानकारी किसी भी तरह से डॉक्टर्स राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए आप किसी एक्सपर्ट्स या फिर जिस समस्या से जूझ रहे हैं, उस क्षेत्र के डॉक्टर से सलाह लेने के बाद ही उस एडवाइस पर अमल करें. Fit Rahe India इस जानकारी के लिए किसी भी जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है. इस तरह के कॉन्टेंट को देखने के लिए आप हमारे Youtube चैनल के साथ जुड़ सकते हैं. )

FAQ

1. मोटापा क्या है?

जब शरीर में अत्यधिक वसा (Fat) जमा हो जाता है जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो, तो उसे मोटापा कहते हैं. Adults में BMI 30 या उससे अधिक होने पर इसे मोटापा माना जाता है.

2. पतले लोगों में मोटापा (Obesity in Thin People)

इसे मेडिकल टर्म में ‘Thin-Fat’ (Skinny Fat) या ‘Normal Weight Obesity’ कहा जाता है. डॉ. अनूप मिश्रा जैसे विशेषज्ञों ने भारतीय आबादी में इस स्थिति पर काफी रिसर्च किया है. इसमें व्यक्ति बाहर से देखने में “पतला” या “सामान्य वजन” का दिखता है और उसका BMI भी सामान्य (18.5–24.9) होता है, लेकिन उसके शरीर के अंदर (Fat) का प्रतिशत बहुत अधिक और मांसपेशियां (Muscle) बहुत कम होती हैं.

3. मोटापे से क्या बीमारियां हो सकती हैं?

इससे टाइप 2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग, जोड़ों में दर्द (गठिया) और नींद में सांस लेने की तकलीफ (Sleep Apnea) का खतरा बढ़ जाता है.

sarthak arora
sarthak arora
अपनी उंगलियों से खबरों को खटाखट लिखना, और लिखने से पहले पढ़ना और समझना. इस तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में 7 साल का अनुभव पाया. कार्य जारी है और इसी तरह लिखना, पढ़ना और सीखना निरंतर जारी रहेगा.
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