Ebola Virus Outbreak 2026: अफ्रीका में तेजी से इबोला का स्ट्रेस बुंडीबुग्यो वायरस तेजी से फैल रहा है. इस वायरस के बढ़ते हुए खतरे के बीच एक अच्छी खबर सामने आई है. जानकारी है कि यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड ने इस वायरस से लड़ने के लिए दुनिया का पहला फेज-1 क्लीनिकल ट्रायल शुरू कर दिया है.
इस ट्रायल का मकसद यह पता लगाना है कि यह वैक्सीन इंसानों के लिए कितनी सुरक्षित है और शरीर में कितनी अच्छी प्रतिरक्षा (इम्यून रिस्पॉन्स) पैदा करती है. यह ट्रायल फिलहाल ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड शहर में चल रहा है. इसमें 18 से 55 साल के 50 स्वस्थ वयस्कों को शामिल किया जाएगा. फिलहाल स्वयंसेवकों की भर्ती शुरू हो चुकी है. जरूरी मंजूरी मिलने के बाद उन्हें वैक्सीन दी जाएगी और कुछ समय तक उनकी सेहत पर नजर रखी जाएगी.
क्या है वैक्सीनेशन का नाम?
जानकारी के अनुसार सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने रिकॉर्ड समय पर ये वैक्सीन तैयार की है. आप इस वैक्सीन को ChAdOx1 BDBV के नाम से जान सकते हैं. वहीं इसे तेजी से क्लीनिकल ट्रायल तक पहुंचाने में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) ने बड़ी भूमिका निभाई है. सीरम इंस्टीट्यूट ने सिर्फ दो हफ्तों में इस वैक्सीन की करीब 6.2 लाख (620,000) डोज तैयार कर स्टॉक कर ली हैं. इसके अलावा फेज-1 ट्रायल के लिए 4,000 डोज भी उपलब्ध कराई गई हैं.
CEPI देगा 8.6 मिलियन डॉलर की फंडिंग
इस परियोजना को Coalition for Epidemic Preparedness Innovations (CEPI) का सहयोग मिल रहा है. CEPI ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और सीरम इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर इस वैक्सीन के विकास के लिए 86 लाख अमेरिकी डॉलर (8.6 मिलियन डॉलर) का फंड दिया है. अगर शुरुआती ट्रायल सफल रहते हैं तो आगे बड़े स्तर पर क्लीनिकल ट्रायल किए जाएंगे, ताकि आपातकालीन इस्तेमाल (Emergency Use Authorization) या लाइसेंस के लिए जरूरी डेटा जुटाया जा सके.
ऑक्सफोर्ड वैज्ञानिकों ने क्या कहा?
ऑक्सफोर्ड की वैज्ञानिक प्रोफेसर टेरेसा लैम्बे ने कहा कि Bundibugyo Ebola का मौजूदा प्रकोप प्रभावित देशों में गंभीर स्थिति पैदा कर रहा है. ऐसे समय में प्रभावी वैक्सीन की जरूरत बेहद जरूरी है. उन्होंने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा इस प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने के सिर्फ 57 दिनों के भीतर उनकी टीम वैक्सीन को फेज-1 ट्रायल तक पहुंचाने में सफल रही है.
फेज-1 ट्रायल का उद्देश्य क्या है?
इस अध्ययन की प्रमुख जांचकर्ता प्रोफेसर कैटरीना पोलॉक ने बताया कि इस ट्रायल का उद्देश्य यह जानना है कि वैक्सीन:
- इंसानों के लिए सुरक्षित है या नहीं.
- इसके कोई गंभीर दुष्प्रभाव तो नहीं हैं.
- शरीर में कितनी मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करती है, उन्होंने लोगों से इस ट्रायल में स्वयंसेवक के रूप में भाग लेने की भी अपील की है.
CEPI ने बताया बड़ा कदम
CEPI की डॉ. निकोल लुरी ने कहा कि Bundibugyo Ebola का मौजूदा प्रकोप अब तक के सबसे बड़े इबोला प्रकोपों में से एक बन चुका है और संक्रमित मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है. उन्होंने कहा कि इतनी कम अवधि में वैक्सीन को मानव परीक्षण तक पहुंचाना वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है.
नया नहीं इबोला वायरस
आपको बता दें कि इबोला वायरस नया नहीं है. साल 1976 में अफ्रीका में इस वायरस की पहचान हो चुकी है. ये वायरस संक्रमण से फैलता है. इंसानों के साथ-साथ जंगली जानवर जैसे चमगादड़ और बंदरों को भी प्रभावित कर सकती है. इसका नाम इबोला नदी के नाम से रखा गया था, जो कांगो के पास बहती है.
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(Disclaimer: यहां दी गई सलाह और ये कॉन्टेंट केवल सामान्य जानकारी के लिए पेश किया गया है. यानी ये जानकारी किसी भी तरह से डॉक्टर्स राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए आप किसी एक्सपर्ट्स या फिर जिस समस्या से जूझ रहे हैं, उस क्षेत्र के डॉक्टर से सलाह लेने के बाद ही उस एडवाइस पर अमल करें. Fit Rahe India इस जानकारी के लिए किसी भी जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

