Early Warning Signs Of Chronic Kidney Disease: हमारी बॉडी के लिए किडनी काफी अहम रोल प्ले करती है. हमारे खून से गंदगी को बाहर निकालकर फिल्टर करने शरीर में तरल पदार्थों को बैलंस्ड बनाए रखने, ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने यहां तक की हड्डियों और ब्लड वेसल्स को हेल्दी रखने में अहम भूमिका निभाती है.
लेकिन चिंता की बात ये है कि किडनी के काम करने की पावर कम होने लगती है. हालांकि जब ऐसा होता है तो हमारी बॉडी शुरुआती फेज में कुछ स्पष्ट संकेत नहीं देता. इसलिए क्रॉनिक किडनी डिजीज को एक साइलेंट बीमारी भी माना जाता है. हालांकि आज किडनी की बात हम इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि देशभर में किडनी की समस्याएं तेजी से बढ़ती जा रही है. कई बार चेतावनी भी दी जा चुकी है.
देशभर में बढ़ रही किडनी डिजीज
दरअसल हाल ही में मेडिकल जर्नल द लैंसेट में तीन रिसर्च पब्लिश हुईं जिनमें ये चेतावनी दी गई कि क्रॉनिक किडनी डिजीज दुनिया की सबसे तेज बढ़ने वाली हेल्थ चुनौती में से एक बनती जा रही है. रिपोर्ट बताती है कि दुनियाभर में करीब 788 से 844 मिलियन एडल्ट इस समस्या से प्रभावित हैं. इतना ही नहीं साल 2040 तक ये ग्लोबल लेवल पर मृत्यु के प्रमुख कारणों और पांचवें स्थान पर पहुंच सकती है.
क्या है इस बीमारी की बढ़ोत्तरी का कारण?
इस बीमारी के बढ़ने पर एक्पर्ट्स का मानना है कि डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, हार्ट प्रॉब्लम और बढ़ती हुई उम्र इस बढ़ती हुई बीमारी के प्रमुख कारणों में से एक हो सकते हैं. इतना ही नहीं खराब लाइफस्टाइल, खराब खानपान भी हमारी किडनी पर गहरा और एक्ट्रा प्रेशर भी डाल रही है. WHO भी ये बात मानता है कि किडनी की बीमरी अक्सर शुरुआती चरण में बिना लक्षणों के दिखाई दिए ही बढ़ता है. इसलिए समय-समय पर चेकअप करवाने की सलाह हमेशा दी जाती है.
जितना जल्दी इलाज मिलेगा बेहतर होगा
वहीं द लैंसेट की पहली स्टडी बताती है कि किडनी की बीमारी की पहचान के लिए नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है. जैसे ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट, एल्बूमिन्यूरिय टेस्ट, एडवांस इमेजिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अन्य हाई टेकनीक को इस्तेमाल में लिया जा रहा है. जिससे की बीमारी को शुरुआती स्टेज में ही पकड़ने में मदद की जा सके. रिसचर्स ऐसा मानते हैं कि जितनी ही जल्दी बीमारी का पता लगाया जा सके उतनी ही जल्दी इलाज के लिए ये बेहतर साबित होगा.
दूसरी स्टडी बताती है कि पुरुषों और महिलाओं में किडनी की बमारी का असर एक जैसा नहीं होता. यानी दोनों के शरीर में किडनी की बनावट, बीमारी की प्रोग्रेस और इलाज के प्रति रिएक्शन अलग-अलग हो सकते हैं. यानी फ्यूचर में किडनी के इलाज के लिए अधिक पर्सनल और जरूरत के हिसाब से तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है.
क्या कहती है तीसरी स्टडी?
अब तीसरी स्टडी क्या कहती है? तो तीसरी स्टडी में पाया गया कि नई दवाएं जैसे एसजीएलटी2 इनहिबिटर्स , ग्लूकागॉन-लाइक पेप्टाइड-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट और अन्य एडवांस इलाज से किडनी की बीमारी की रफ्तार को धीमा करने में काफी अच्छे रिजलट्स मिल सकते हैं. इतना ही नहीं ये दवाएं हार्ट की हेल्थ को भी बेहतर बनाने में मदद कर सकती है. हालांकि फिलहाल एक्सपर्ट्स का ये भी कहना है कि मरीजों में अक्सर डायबिटीज, मोटापा और हृदय रोग जैसी कई समस्याएं एक साथ होती हैं, इसलिए समग्र उपचार की आवश्यकता होती है.
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