ICMR-NIN Diet Diversity Score: छोटे बच्चे दिखने में काफी हेल्दी लगते हैं. लेकिन क्या सच में वो हेल्दी हैं? क्या उनके शरीर को जिस विटामिन और मिनरल्स की जरूरत है वो मिल रहे हैं या उसकी कमी तो नहीं. क्योंकि इनकी कमी तुरंत ही नहीं दिखाई देती. नतीजा ये उनके फिजिकल डेवलपमेंट, मेंटल पावर, पढ़ाई और इम्युनिटी सिस्टम पर असर डालती है.
लेकिन घबराने की बात नहीं. क्योंकि अब IMCR और NIN हैदराबाद के साइंटिस्ट ने इस समस्या को हल निकालने के लिए एक नया तरीका निकाला है. जो काफी आसान होने वाला है. साथ ही इस तरीके से 6 से 10 साल के बच्चे के खाने पीने और उसके आकलन करके ये पता लगाया जा सकेगा कि क्या उनके शरीर में पोषक तत्वों की कमी है या फिर नहीं. इसपर एक रिसर्च हुई है. जानकारी है कि इस रिसर्च के रिजल्ट्स यूरोपियन जर्नल ऑफ क्लीनिकल न्यूट्रीशियन में भी पब्लिश हुए हैं.
आखिर क्यों जरूरी है यह नया तरीका?
पहले जान लेते हैं कि आखिर ये नया तरीका क्यों जरूरी है, तो बता दें कि भारत और उसके साथ-साथ कई देशों में बच्चों में आयरन, कैल्शियम, विटामिन A, विटामिन B12 जैसे पोषक तत्वों की कमी एक बड़ी समस्या बनी हुई है.
इन पोषक तत्वों की कमी से बच्चे:
- शारीरिक रूप से कमजोर हो सकते हैं.
- उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो सकती है.
- दिमाग का विकास प्रभावित हो सकता है.
- पढ़ाई में ध्यान लगाने और सीखने की क्षमता घट सकती है.
- बार-बार बीमार पड़ने का खतरा बढ़ जाता है.
सबसे बड़ी बात यह है कि कई बार यह कमी बाहर से दिखाई भी नहीं देती.
नया Diet Diversity Score (DDS) क्या है?
अब साइंटिस्ट ने इसे लेकर एक स्कोर तैयार किया है. जिसे डाइट डायवर्सिटी स्कोर (DDS) नाम दिया गया है. इसका मतलब है कि बच्चा अपने रोज़ के खाने में कितनी तरह के पौष्टिक खाद्य पदार्थ खा रहा है. शोधकर्ताओं ने खाने की चीज़ों को 13 अलग-अलग खाद्य ग्रुप्स में बांटा है. इनमें अनाज, दालें, दूध, अंडा, फल, सब्जियां, हरी पत्तेदार सब्जियां, विटामिन A से भरपूर फल और सब्जियां जैसी कई श्रेणियां शामिल हैं. यदि बच्चा इन अलग-अलग खाद्य समूहों से नियमित रूप से भोजन करता है, तो उसके शरीर को जरूरी विटामिन और मिनरल्स मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है.
सिर्फ 5 ग्राम भोजन भी माना जाएगा
इस नए तरीके की खास बात यह है कि इसमें किसी फूड ग्रुप की सिर्फ 5 ग्राम मात्रा भी गिनी जाएगी. यानी अगर बच्चे ने थोड़ासा फल, थोड़ी दाल, कुछ सब्जियां या किसी मिश्रित भोजन में थोड़ा दूध भी लिया है, तो उसे भी स्कोर में शामिल किया जाएगा. यह तरीका भारतीय खान-पान के हिसाब से बनाया गया है, क्योंकि हमारे यहां कई पौष्टिक चीजें कम मात्रा में लेकिन अलग-अलग व्यंजनों के साथ खाई जाती हैं.
रिसर्च में क्या पता चला?
वैज्ञानिकों ने बच्चों के खान-पान की तुलना उनके शरीर में मौजूद 10 जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों और हीमोग्लोबिन स्तर से की. शोध में पाया गया कि जिन बच्चों ने 13 में से कम से कम 10 खाद्य समूहों से रोज़ाना भोजन किया, उनके शरीर में जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों की लगभग 70% दैनिक आवश्यकता पूरी होने की संभावना काफी अधिक थी. इतना ही नहीं, इन बच्चों में हीमोग्लोबिन का स्तर भी बेहतर पाया गया.
वैज्ञानिकों ने क्या कहा?
अध्ययन का नेतृत्व करने वाले वैज्ञानिक डॉ. सुब्बाराव एम. गवारावरपु के अनुसार, भोजन में विविधता यानी अलग-अलग तरह के पौष्टिक खाद्य पदार्थ खाना, अच्छी डाइट का सबसे आसान और भरोसेमंद संकेत है. यह नया स्कोर ऐसे बच्चों की जल्दी पहचान करने में मदद करेगा जिनमें पोषक तत्वों की कमी होने का खतरा है, ताकि समय रहते उन्हें सही पोषण और इलाज मिल सके.
वहीं, आईसीएमआर-एनआईएन की निदेशक डॉ. भारती कुलकर्णी ने कहा कि यह उपकरण स्कूलों, आंगनवाड़ी (ICDS), स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रमों, शिक्षकों, अभिभावकों, पोषण विशेषज्ञों और स्वास्थ्य कर्मियों के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकता है. हालांकि इसे पूरे देश में लागू करने से पहले अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में और परीक्षण किए जाएंगे.
क्यों है यह शोध महत्वपूर्ण?
भारत में लाखों बच्चे ऐसे हैं जिनके शरीर में पोषक तत्वों की कमी होती है, लेकिन इसकी जानकारी समय पर नहीं मिल पाती. ICMR-NIN का यह नया Diet Diversity Score (DDS) बच्चों के खान-पान की जल्दी जांच करने का आसान तरीका बन सकता है. इससे समय रहते पोषण संबंधी कमी की पहचान होगी, सही सलाह दी जा सकेगी और बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य, विकास और भविष्य को सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी.
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