Sehat Ki Khabar: नमस्कार फिट रहे इंडिया की लेटेस्ट अपडेट्स में आपका स्वागत है. क्या आपने भी डॉक्टर से मिलने के बाद अपनी बीमारी के बारे में इंटरनेट पर जानकारी ढूंढी है. अगर ऐसा है तो ये एक बीमारी हो सकती है. सेहत की खबर के पहले सेगमेंट में आपको बताएंगे डॉक्टर से मिलकर आने के बाद भी मरीज़ अपनी बीमारी का इलाज इंटरनेट पर आखिर क्यो ढूंढ रहे हैं.
सिर्फ पानी पीने से नहीं दूर होगी डिहाइड्रेशन की समस्या. शरीर को इलेक्ट्रोलाइट्स की भी होती है जरूरत, वो कैसे मिलेंगे इसपर बात करेंगे सेहत की खबर के दूसरे सेगमेंट में.
पीठ में दर्द किस जगह पर है इससे पता चलता है कि ये कौन सी बीमारी का लक्षण है. ये वॉर्निंग साइन्स सीधे यूनाइटेड किंगडम से आए है. क्या है वो संकेत इसपर बात करेंगे सेहत की खबर के तीसरे और आखिरी सेगमेंट में चलिए शुरू करते हैं.
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दिल्ली के मरीज़ों का नया डॉक्टर
क्या आप जानते हैं कि इंटरनेट पर बार बार अपनी बीमारी के बारे में लक्षण, इलाज और ऐसी दूसरी बातें सर्च करने को एक बीमारी का नाम दे दिया गया है. ये बीमारी है इडियट सिंड्रोम यानी internet derived information obstructing treatment यानी आपको डॉ ने कुछ सलाह दी लेकिन इंटरनेट ने कुछ और बताया और अब आप सोच में हैं कि क्या करें.
वैसे इसे बीमारी तब माना जाता है. जब कोई इंसान हर दूसरे दिन या हर वक्त अपनी बीमारी के बारे में सोचता रहे और सर्च करता रहे. दिल्ली एनसीआर के लोग भी अपनी बीमारी का इलाज इंटरनेट पर ढूँढ रहे हैं ये सभी इडियट सिंड्रोम के शिकार नहीं है. तो फिर ये ऐसा क्यों कर रहे हैं. इस बारे में एक सर्वे सामने आया है. दिल्ली-एनसीआर में बड़ी संख्या में मरीज डॉक्टर से मिलने के बाद भी अपनी स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए गूगल और सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं.
यह रिपोर्ट इंडिया पेशेंट नेविगेशन एंड कन्फ्यूजन इंडेक्स (IPNCI) 2026 द्वारा जारी की गई है. इसके लिए दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद और गाजियाबाद के 1,000 लोगों का सर्वे किया गया. रिपोर्ट में पाया गया कि कई मरीज अपनी बीमारी, इलाज और आगे की मेडिकल प्रक्रिया को समझने में परेशानी महसूस करते हैं. यही वजह है कि डॉक्टर से मिलने के बाद भी वे इंटरनेट पर जानकारी तलाशने लगते हैं. हालांकि सर्वे दिल्ली एनसीआर में किया गया है लेकिन हमें यकीन है आप जिस शहर से भी ये खबर देख रहे हैं. आप भी यही कर रहे होंगे.
सर्वे के मुताबिक, 78.5% मरीजों ने बताया कि डॉक्टर से मिलने के बाद उन्हें अपनी बीमारी या इलाज को लेकर पूरी जानकारी नहीं मिली. इस वजह से उन्होंने गूगल, सोशल मीडिया या अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर जानकारी खोजी. वहीं 73.8% मरीजों का कहना था कि डॉक्टर से बातचीत के दौरान उन्हें जल्दबाजी महसूस हुई और वे अपने सभी सवाल ठीक से नहीं पूछ पाए.
रिपोर्ट के अनुसार, करीब 70% मरीजों ने कहा कि उन्हें यह स्पष्ट जानकारी नहीं मिली कि ब्लड टेस्ट, स्कैन या अन्य जांच के बाद आगे क्या करना है और किस विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए. इसके अलावा 78% लोगों ने बताया कि डॉक्टर, अस्पताल, डायग्नोस्टिक सेंटर और फार्मेसी के बीच तालमेल की कमी होती है जिससे वो परेशान होते हैं और इंटरनेट पर अपने सवालों के जवाब खोजते हैं.
सर्वे में शामिल 10 में से 7 से ज्यादा लोगों ने कहा कि उनके पास ऐसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं जो इलाज की पूरी प्रक्रिया में उनका मार्गदर्शन कर सकें.
इन सुविधाओं में शामिल हैं:
- पेशेंट कोऑर्डिनेटर
- अस्पताल की हेल्पडेस्क
- हेल्पलाइन सेवाएं
- डिजिटल नेविगेशन टूल
रिसर्चर्स का कहना है कि इन सेवाओं की कमी के कारण मरीज अक्सर इंटरनेट या दोस्तों-रिश्तेदारों की सलाह पर निर्भर हो जाते हैं.
रिपोर्ट में एक और अहम बात सामने आई. कई मरीज स्थानीय या सेकेंडरी हेल्थकेयर सुविधाओं की बजाय सीधे बड़े निजी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं. करीब 36% लोगों ने बताया कि उन्होंने पहले छोटे अस्पताल या सेकेंडरी केयर सेंटर में जाने के बजाय सीधे बड़े निजी अस्पतालों में इलाज करवाना पसंद किया. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे इलाज का खर्च बढ़ता है और बड़े अस्पतालों पर मरीजों का दबाव भी बढ़ जाता है.
सर्वे में केवल 21.4% लोगों ने बताया कि उन्होंने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का इस्तेमाल किया, जबकि ये सुविधाएं अपेक्षाकृत सस्ती होती हैं.
पैसिफिक वनहेल्थ हॉस्पिटल के संस्थापक साकेत बंसल के मुताबिक, भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण कड़ी की कमी दिखाई देती है. उनका कहना है कि मरीज सीधे बड़े अस्पतालों में पहुंच रहे हैं क्योंकि सेकेंडरी हेल्थकेयर सिस्टम अभी भी कमजोर और बिखरा हुआ है. यदि इस स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किया जाए तो मरीजों का भ्रम कम होगा, इलाज की प्रक्रिया आसान बनेगी और अनावश्यक खर्च भी घटेगा.
रिसर्च में दिल्ली-एनसीआर को 68.5 अंक दिए गए और इसे “हाई कन्फ्यूजन, लो नेविगेशन” कैटेगरी में रखा गया. रिपोर्ट के अनुसार, मरीजों को इलाज के अलग-अलग चरणों में सही मार्गदर्शन देने के मामले में स्वास्थ्य व्यवस्था सबसे ज्यादा कमजोर दिखाई दी. यही कारण है कि बड़ी संख्या में लोग डॉक्टर के क्लिनिक से निकलने के बाद भी अपनी बीमारी और इलाज को लेकर असमंजस में रहते हैं.
अब बढ़ते हैं सेहत की खबर के दूसरा सेगमेंट में
गर्मियों का मौसम है, ऐसे मौसम में अपनी एक्ट्रा केयर करनी पड़ती है. खुद को हाइड्रेट रखना पड़ता है. इसके लिए खूब सारा पानी का इनटेक करना बहुत जरूरी हो जाता है. लेकिन क्या हो कि अगर आप ढेर सारा पानी भी पी लें तब भी आपकी तबियत बिगड़ जाए. 3 लीटर से अधिक भरपूर पानी पीने के बाद भी अगर डॉक्टर आपसे ये कह दे कि आपके शरीर में पानी की कमी है तो कैसा लगेगा?
बेशक हैरानी ही होगी. डॉक्टर्स बताते हैं कि खुद को हाइड्रेट रखने के लिए सिर्फ पर्याप्त मात्रा में पानी पी लेना काफी नहीं होता. क्योंकि पानी के साथ-साथ इलेक्ट्रोलाइट्स का भी सही बैलंस होना उतना ही जरूरी होता है. इसलिए पानी पीना काफी नहीं होता है.
डॉक्टर्स मानते हैं कि हमारी बॉडी को सिर्फ पानी की जरूरत नहीं होती है. इसके साथ-साथ शरीर को सोडियम, पोटैशियम और मैग्नीशियम जैसे दूसरे मिनरल्स भी जरूरत होती हैं. क्योंकि ये सब मिनरल्स हमारे पसीने के जरिए बाहर निकल जाते हैं इसलिए शरीर में पानी की कमी को पूरा करने की ज़िम्मेदारी सिर्फ पानी पर ना छोड़ें – एक साथ बहुत सारा पानी ना पिएं तो करना क्या है. जिससे पानी की कमी भी पूरी हो जाए और आप हीट स्ट्रोक जैसी जानलेवा हालत से भी बचे रहें अब वो नोट करें.
इसके लिए पहले ये समझिए कि हमें गर्मी या लू क्यों लगती हैः
हम जो पानी पीते हैं वो स्किन से पसीने के जरिए, फेफड़ों से सांस के जरिए और पाचन तंत्र से यूरिन और मल के रुप में बाहर निकल जाता है. इसी के साथ शरीर के लिए जरुरी नमक यानी सोडियम भी पानी में निकल जाता है. ज्यादा गर्मी यानी ज्यादा पसीना यानी ज्यादा वॉटर लॉस
न्यूट्रिशनिस्ट एक्सपर्ट लवनीत बत्रा ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट किया इसमें उन्होंने बताया कि केवल पानी पीने से डिहाइड्रेशन की समस्या दूर नहीं होती है. उनका कहना है कि आपको दूसरे मिनरल्स की भी जरूरत पड़ती है. न्यूट्रिशनिस्ट ने बताया कि आपके शरीर को सोडियम, पोटैशियम और मैग्नीशियम भी चाहिए होता है. इन्ही को इलेक्ट्रोइट्स कहते हैं.
लू लगने से ऐसे बचें
इसकी कमी पूरी करने का सबसे आसान तरीका है ओआरएस यानी ओरल रि-हाइड्रेशन सोल्यूशन का पैकेट पूरा पैकेट एक लीटर पानी में मिलाइए और साधारण पानी की जगह ओआरएस मिला पानी पीते रहिए लू नहीं लगेगी. अगर ओआरएस नहीं है तो आप नींबू, चीनी, नमक और पानी मिलाकर शिकंजी बना सकते हैं. लेकिन अगर आपको हाईबीपी या डायबिटीज़ है तो शिकंजी या ओआरएस सीमित मात्रा में ही लें.
शरीर में पानी की कमी हो रही है या नहीं ये आपको कैसे पता चलेगा लक्षण नोट करिए:
- सिरदर्द और थकान
- चक्कर आना
- दिमाग सुस्त होना और पैरों में दर्द – खास तौर पर Calf Muscles में दर्द होने लगे तो ये संकेत है कि आपके शरीर में पानी की भयंकर कमी है.
पानी पीजिए और अब पढ़िए हमारी अगली खबर:
आजकल कई लोग पीठ में दर्द की शिकायत लेकर घूमते हैं. पीठ में दर्द की समस्या अब काफी आम हो चुकी है. इसके पीछे का कारण है खराब पोश्चर. लेकिन अगर हम कहें कि यही पीठ का दर्द आपके किसी बड़ी बीमारी के शुरुआती संकेत हो सकता है? हालांकि पीठ के दर्द को अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं. उतना तवज्जो नहीं देते जितना देना चाहिए.
अब इसे लेकर यूनाइटेड किंगडम की नेशनल हेल्थ सर्विस यानी NHS ने 8 ऐसे संकेत बताए हैं जिसे आपको कभी इग्नोर नहीं करना चाहिए. 8 संकेत जानेंगे लेकिन उससे पहले जान लेते हैं कि आखिर लगातार पीठ में होने वाले दर्द का क्या कारण है? आइए इसपर डिटेल में बात करते है.
पीठ दर्द के ये 3 लक्षण ना करना इग्नोर
क्या आप जानते हैं कि पीठ का दर्द कई तरह का होता है. अचानक चुभन वाला दर्द, हल्का मसल्स में होने वाला दर्द या फिर पीठ में नुकीली चीज जैसे चुभने वाला दर्द. इसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसे ही दर्द पीठ से हाथों और पैरों तक भी पहुंच सकते हैं. नतीजा झुकने, शरीर को मोड़ने या फिर कोई भारी सामान उठाने, अधिक देर तक खड़े रहने चलने-फिरने में दिक्कत खड़ी कर सकते हैं.
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