Delhi IVF Center Accused Of Baby Swapping: IVF तकनीक कपल्स की जिंदगियां सवर रही हैं? या उन खुशी के आंसू को दुख में बदल रही है? दरअसल ये सवाल इसलिए जरूरी है क्योंकि हाल में आए मामले ने इस बात पर सोचने को मजबूर कर दिया है. गौरतलब है कि हाल ही में एक दंपत्ति ने IVF तकनीक की मदद से दो जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया है. लेकिन वह बच्चियां उनकी नहीं हैं.
इस खबर से सभी हैरान और परेशान हैं. बता दें कि गुरुग्राम के रहने वाले एक दंपती ने दक्षिणी दिल्ली के ग्रेटर कैलाश स्थित IVF सेंटर पर बच्चों की अदला-बदला का आरोप लगाया है. अब उन्होंने दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता से दखल देने की अपील की है. दिल्ली की अदालत ने पुलिस को केस दर्ज करने और जांच करने का निर्देश दिया है.
क्यों बढ़ रहा है IVF का चलन?
आज के समय में IVF (In Vitro Fertilization) यानी टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक का चलन तेजी से बढ़ रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह है बढ़ती इनफर्टिलिटी (बांझपन) की समस्या और लोगों में फर्टिलिटी ट्रीटमेंट को लेकर बढ़ती जागरूकता. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनियाभर में लगभग हर 6 में से 1 व्यक्ति अपने जीवन में किसी न किसी समय इनफर्टिलिटी की समस्या का सामना करता है.
वहीं आज के समय में ऐसे कई कपल्स करियर, आर्थिक स्थिति और अन्य कारणों से परिवार शुरू करने में देरी करते हैं. वहीं उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं में अंडों की गुणवत्ता और पुरुषों में स्पर्म क्वालिटी पर असर पड़ता है, जिससे गर्भधारण में परेशानी आती है. इसके अलावा PCOS, एंडोमेट्रियोसिस, फैलोपियन ट्यूब ब्लॉकेज और पुरुषों से जुड़ी फर्टिलिटी समस्याएं भी IVF की जरूरत बढ़ा रही हैं.
ऐसे में IVF तकनीक की मदद से डॉक्टर लैब में अंडे और स्पर्म को मिलाकर भ्रूण (Embryo) तैयार करते हैं और उसे महिला के गर्भाशय में ट्रांसफर किया जाता है. मेडिकल टेक्नोलॉजी में सुधार, बेहतर जांच और फर्टिलिटी क्लीनिक की उपलब्धता ने भी IVF को ज्यादा लोगों तक पहुंचाया है. हालांकि एक्सपर्ट कहते है कि IVF हर किसी के लिए पहला विकल्प नहीं होता. सही समय पर जांच, लाइफस्टाइल में सुधार और डॉक्टर की सलाह के बाद ही इलाज का फैसला लेना चाहिए. WHO ने भी इनफर्टिलिटी के लिए सुरक्षित, सुलभ और वैज्ञानिक इलाज की जरूरत पर जोर दिया है.
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IVF होता क्या है?
IVF का पूरा नाम है ‘इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (In Vitro Fertilization)’ होता है, जिसे शॉर्ट में IVF कहा जाता है. इसे आम बोलचाल में ‘टेस्ट ट्यूब बेबी’ तकनीक भी कहा जाता है. यह एक प्रमुख प्रजनन उपचार (Fertility Treatment) है, जिसमें महिला के अंडे और पुरुष के शुक्राणु को शरीर के बाहर यानी लैब में मिलाया जाता है. इस मिलन के बाद जो भ्रूण तैयार होता है, उसे कुछ दिनों तक लैब में पाला जाता है और फिर महिला के गर्भाशय में ट्रांसफर किया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में 15-20 दिन का समय लगता है.
क्या है पूरा मामला?
दंपत्ति ने जनवरी 2026 में ग्रेटर कैलाश स्थित IVF सेंटर पर उन्होंने यहां IVF तकनीक की मदद से दो जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया था. लेकिन जैसे- जैसे बच्चियां बड़ी होने लगी उनकी शक्ल परिवार के किसी भी सदस्य से मैच नहीं कर रही थी. ऐसे में उन्हें शक हुआ और जब DNA Test कराया गया तो DNA टेस्ट मैच नहीं हुआ. लैब रिपोर्ट के मुताबिक दोनों बच्चियों का बायोलॉजिकल मैच न तो अपनी मां से हो रहा है और न ही पिता से. यानी क्लिनिक ने उनका भ्रूण किसी और कपल के भ्रूण से बदल दिया. शिकायतकर्ता राहुल व मीनू राठौर द्वारका एक्सप्रेसवे पर सेक्टर-111 स्थित पुरी डिप्लोमेटिक ग्रीन्स सोसाइटी में रहते हैं.
मामले में कोर्ट का रूख
पूरे मामले को लेकर दंपती का दरवाजा खटखटाया है. कोर्ट ने पुलिस को केस दर्ज कर जांच करने के निर्देश दिए है. वहीं दंपती की मांग है कि क्लिनिक के IVF रिकॉर्ड, भ्रूण से जुड़े दस्तावेज, लैब डेटा, इलेक्ट्रॉनिक डेटा और CCTV फुटेज को जांच के लिए सुरक्षित रखा जाए. लेकिन अब तक पुलिस ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है. पीड़ित राहुल राठौर के मुताबिक सबसे पहले वे 17 जनवरी को डीसीपी के पास गए और 22 जनवरी को ग्रेटर कैलाश थाने के एसएचओ से मिले. शिकायत की पर तीन महीने FIR ही नहीं दर्ज की गई. कोर्ट के आदेश पर 31 मार्च को FIR दर्ज हुई.
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