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Do Not Use Mobile While Driving: ड्राइविंग के वक्त मोबाइल पर चैटिंग ले रही जान

Do Not Use Mobile While Driving:बाइक पर चली आ रही सवारी की एक नज़र रेड लाइट पर है और ध्यान फोन पर। गाड़ी चलाते वक्त फोन का इस्तेमाल करते हैं।

Do Not Use Mobile While Driving: बाइक पर चली आ रही सवारी की एक नज़र रेड लाइट पर है और ध्यान फोन पर, कैमरे पर नज़र ना जाती तो शायद रेड लाइट भी पार कर डालते। कैमरा देखकर अफसोस करने से बेहतर है, ये सोचना कि गाड़ी चलाते वक्त मोबाइल फोन इस्तेमाल करके लोग अपनी जान को खतरे में डाल रहे हैं। ड्राइविंग करते शख्स के लिए मोबाइल फोन कान पर लगा डिवाईस नहीं, कनपटी पर लगी बंदूक साबित हो सकता है – सावधानी हटी और दुर्घटना घटी।

सेफ लाइफ फाउंडेशन के CEO पीयूष तिवारी ने बताया कि, No mobile-When mobile ऐसी हज़ारों कैंपेन के बावजूद लोंगों में आदतें नहीं बदली। यही वजह है जब हमने सेफ ड्राइविंग प्रैक्टिस पर काम करने को लेकर सर्वे किया तो सर्वे में शामिल 48 फीसदी लोगों ने खुद मान लिया कि वो ड्राइव करते वक्त मोबाइल फोन का यूज़ करते हैं। यानी लगभग हर दूसरा व्यक्ति उस वक्त मोबाइल फोन का इस्तेमाल करता है, जब उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। ये सर्वे आठ शहरों बैंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली, कोलकाता, कानपुर, जयपुर, मैंगलुरु और मुंबई में किया गया।

भारत में 50 फीसदी एक्सीडेंट रेट बढ़ा

कई विकासशील देशों श्रीलंका पाकिस्तान तक ने अपना एक्सीडेंट रेट कम किया है लेकिन हमारे यहां पिछले 10 सालों में 50 फीसदी एक्सीडेंट बढ़े हैं। हालांकि अब विकसित देशों में फोन यूज़ करने की वजह से एक्सीडेंट रेट बढ़ रहे हैँ। मोटर व्हीकल एक्ट अप्रैल में लोक सभा से पास हो गया था लेकिन राज्य सभा में अभी पेंडिंग है। इसमें ये प्रावधान है कि एक्सीडेंट में मौके पर जाने वाला पुलिस वाला ये नोट करेगा कि ड्राइवर एरर में किस तरह का एरर था। कहीं इसमें मोबाइल का इस्तेमाल तो नहीं हुआ था।

अमेरिका के नेशनल ट्रैफिक हाइवे सेफ्टी एडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक एक मैसेज पढ़ने में औसतन 4.6 सेकेंड लग जाते हैं – इतने वक्त में अगर आपकी कार 55 miles per hour पर चल रही है तो आप एक फुटबाल फील्ड का डिस्टेंस कवर कर सकते हैं। एक्सीडेंट होने के लिए तो एक सेकेंड भी काफी है।

ट्रैफिक एक्सीडेंट की बढ़ी संख्या

स्मार्ट फोन का यूज़ करने वालों की संख्या के साथ ही मोबाइल फोन से जुड़े जानलेवा खतरे भी बढ़ते जा रहे हैं। हालांकि अभी तक देश में ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है जिससे ये तय हो सके कि रोड ट्रैफिक एक्सीडेंट में मोबाइल फोन का भी रोल रहा या नहीं, लेकिन जैसे-जैसे रोड ट्रैफिक एक्सीडेंट की संख्या बढ़ रही है, अब ये आंकड़े जुटाने की ज़रुरत बढ़ गई है।

देश के सबसे बड़े अस्पताल एम्स की एमरजेंसी में ट्रामा के साल भर में 70 हज़ार मामले आते हैं इनमें से 40 हज़ार एक्सीडेंट के केस होते हैं। इन 40 हज़ार में से 78 फीसदी के करीब ड्राइवर होते हैं। अब सरकार इस बात का आंकलन कर रही है कि एक्सीडेंट की वजह क्या रही । इसी तरह नए मोटर व्हीकल एक्ट में भी बदलाव करके एक्सीडेंट की वैज्ञानिक पड़ताल की बात कही गई है।

NGO ने किया सर्वे

रोड सेफ्टी पर काम करने वाली संस्था सेव लाइफ फाउंडेशन ने कुछ वर्ष पहले एक दिलचस्प सर्वे किया। सेव लाइफ फाउंडेशन के सर्वे में 47 फीसदी ने माना कि वो गाड़ी चलाते वक्त मोबाइल पर बात करते हैं। ये सर्वे आठ शहरों बैंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली, कोलकाता, कानपुर, जयपुर, मैंगलुरु और मुंबई में किया गया।

-47% गाड़ी चलाते वक्त फोन का इस्तेमाल करते हैं।
-41% काम से जुड़े हुए फोन उठाते हैं।
-94% ने माना कि ये खतरनाक है।
-96% मुसाफिरों को ऐसे ड्राइवर के साथ डर लगता है जो वाहन चलाते वक्त फोन पर हो।
-20% ने माना इस वजह से कई बार एक्सीडेंट की नौबत आई।
-34% को फोन पर बात करते-करते अचानक ब्रेक लगाने पड़े।

मोटर व्हीकल एक्ट के मुताबिक मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने पर पहली बार 5 हज़ार का चालान हो सकता है ये चालान 10 हज़ार रुपए तक का हो सकता है और जेल भी जाना पड़ सकता है लेकिन लोगों की आदत नहीं बदल पाई है।

चालान चाहे एक हज़ार का हो या 5 हज़ार का, मैसेज चाहे बॉस का हो या गर्लफ्रेंड का, दांव पर आपकी जान लगी है। जिस पल आप ये समझ जाएंगे, आप मोबाइल फोन को ना तो कार के स्पीकर पर ट्रांसफर करके उठाएंगे और ना इयरप्लग लगाकर। इसलिए अपने मोबाइल के एयरप्लेन मोड को कार मोड समझें और ड्राइव करते वक्त फोन को not reachable रखें।

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