Thalassemia Blood Donation Tips: भारत में हर 2 सेकंड में किसी न किसी मरीज को ब्लड की जरूरत पड़ती है. एक्सीडेंट, बड़ी सर्जरी, कैंसर, डायलिसिस और थैलेसीमिया जैसी बीमारियों में लाखों लोग ब्लड ट्रांसफ्यूजन पर निर्भर हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है. क्या मरीजों को मिलने वाला ब्लड पूरी तरह सुरक्षित होता है?
इसपर हमने थैलेसीमिया पेशेंट एडवोकेसी ग्रुप की मेंबर सेक्रेटरी और पेशे से वकील अनुभा तनेजा मुखर्जी ,से खास बातचीत की. अनुभा ने अपनी जिंदगी का अनुभव साझा करते हुए बताया कि एक संक्रमित ब्लड बैग उनकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल गया.
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3 महीने की उम्र में पता चली बीमारी
अनुभा को बचपन में बार-बार कमजोरी और शरीर पीला पड़ने की समस्या होने लगी. कई जांचों के बाद दिल्ली के लेडी हार्डिंग अस्पताल में पता चला कि उन्हें Thalassemia Major है. थैलेसीमिया एक जेनेटिक ब्लड डिसऑर्डर है, जिसमें शरीर खुद पर्याप्त स्वस्थ खून नहीं बना पाता. ऐसे मरीजों को हर 15-20 दिन में ब्लड चढ़ाना पड़ता है. उस समय डॉक्टरों को भी इस बीमारी की ज्यादा जानकारी नहीं थी. कई लोगों ने उनके माता-पिता से कहा कि शायद बच्ची ज्यादा समय तक जिंदा नहीं रह पाएगी. लेकिन परिवार ने हार नहीं मानी.
हर 15 दिन में ब्लड की जरूरत
अनुभा बताती हैं कि बचपन में उनके परिवार को हर बार रिश्तेदारों से ब्लड मांगना पड़ता था. कभी चाचा, कभी ताऊ, कभी दोस्त किसी तरह ब्लड का इंतजाम होता था. धीरे-धीरे एक और समस्या सामने आई. बार-बार ब्लड चढ़ाने से शरीर में Iron जमा होने लगा, जो हार्ट, लिवर और हार्मोन पर असर डालने लगा. इसके लिए विदेश से दवाइयां मंगानी पड़ीं.
संक्रमित Blood ने बदल दी जिंदगी
अनुभा डॉक्टर बनना चाहती थीं. लेकिन 11वीं क्लास में उन्हें पता चला कि ब्लड ट्रांसफ्यूजन के जरिए उन्हें Hepatitis C हो गया है. उन्होंने बताया एक खराब ब्लड बैग ने मेरी जिंदगी की दिशा बदल दी. इसके बाद उन्हें लंबे और दर्दनाक इलाज से गुजरना पड़ा. यही वजह है कि आज भी Blood Safety को लेकर वे आवाज उठा रही हैं.
क्या भारत में Blood Screening पूरी तरह सुरक्षित है?
भारत में कानून के अनुसार हर ब्लड बैग की जांच जरूरी है. HIV, Hepatitis B, Hepatitis C, Malaria जैसी बीमारियों के लिए टेस्ट किए जाते हैं. लेकिन समस्या यहां है कि कानून यह नहीं बताता कि कौन-सी तकनीक इस्तेमाल करनी है, कुछ ब्लड बैंक सस्ते टेस्ट करते हैं. जबकि बेहतर और ज्यादा सुरक्षित टेस्ट महंगे होते हैं. यही वजह है कि कई बार वायरस शुरुआती “Window Period” में पकड़ में नहीं आते. अनुभा का कहना है कि भारत में एक मजबूत और एकसमान Blood Law की जरूरत है ताकि हर ब्लड बैंक हाई-स्टैंडर्ड टेस्टिंग करे.
थैलेसीमिया कैसे होता है?
अगर लड़का और लड़की दोनों Thalassemia Minor हों और शादी कर लें, तो उनके बच्चे को Thalassemia Major होने की 25% संभावना रहती है.इसलिए शादी से पहले और प्रेग्नेंसी के दौरान थैलेसीमिया स्क्रीनिंग बेहद जरूरी है. अनुभा कहती हैं कि “कुंडली मिलाने से ज्यादा जरूरी है Thalassemia Screening.”
क्या थैलेसीमिया का इलाज संभव है?
अभी सबसे आम इलाज है रेगुलर ब्लड ट्रांस्फ्यूजन, ऑयरन कंट्रोल मेडिसीन इसके अलावा, Bone Marrow Transplant. यह एक इलाज है, लेकिन इसके लिए सही डोनर मिलना जरूरी होता है.
Gene Therapy
विदेशों में Gene Therapy पर काम हो रहा है. इसमें खराब जीन को ठीक करने की कोशिश की जाती है. लेकिन इसकी कीमत 12 से 16 करोड़ रुपये तक हो सकती है, जो आम भारतीय के लिए बहुत महंगी है.
Blood Donation को लेकर फैली गलतफहमियां
बहुत लोग सोचते हैं कि Blood Donation से कमजोरी आती है या महिलाओं की fertility पर असर पड़ता है. अनुभा ने साफ कहा कि यह गलतफहमी है. उन्होंने बताया कि नियमित Blood Donation से Heart Attack का खतरा कम हो सकता है. स्वस्थ व्यक्ति आसानी से Blood Donate कर सकता है. Blood Donation पूरी तरह सुरक्षित प्रक्रिया है.
कौन Blood Donate कर सकता है?
अगर आपकी उम्र 18 साल से ज्यादा है, वजन 45 किलो से ज्यादा है. कोई गंभीर बीमारी नहीं है. तो आप Blood Donate कर सकते हैं. थैलेसीमिया के साथ भी सामान्य जिंदगी संभव. अनुभा आज एक सफल वकील हैं और 13 साल से शादीशुदा जिंदगी जी रही हैं. उन्होंने कहा कि “थैलेसीमिया का मतलब जिंदगी खत्म होना नहीं है, वे बताती हैं कि सही इलाज, समय पर ब्लड और अच्छी देखभाल के साथ थैलेसीमिया मरीज डॉक्टर, इंजीनियर, वकील कुछ भी बन सकते हैं.
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